ये सोंचते हैं हम, मरने से पहले ..

Emotional artwork based on death and freedom fighters

मरने से पहले.. कभी सोंचा है कि मरते बखत आदमी क्या सोंचता होगा ??.. उसकी मनोदशा क्या होती होगी..

क्या उस वक्त किसी के दिमाग मे उसकी धन- संपत्ति, वैभव, मकान, बीवी बच्चे रिश्तेदार… ये सब आते होंगे?…

मुझे भी नही मालूम..

कोई कहे कि पृथ्वी पर सबसे दुखदाई प्रक्रिया क्या है?.. तो उत्तर है मृत्यु…

क्योंकि मृत्यु शारीरिक रूप से कष्टकारी तो होती ही है, पर इसकी भयावहता बढ़ाता है व्यक्ति का permanently दुनिया से चले जाना.. जिस क्षण किसी की मृत्यु हो रही है, या एकदम मृतप्राय अवस्था मे है और कभी भी जा सकता है,

उस क्षण …

यदि उस मरने से पहले के क्षण व्यक्ति को होश रहे तो शारीरिक कष्ट झेलता हुआ, वो सोंचता होगा कि अब तो चलने की बेला आ गई यहाँ से… इतने प्रपंच यहाँ खड़े किये… मकान बनवाया, नौकरी की, व्यापार किया, शादी हुई, बच्चे हुए…

सब अच्छा था.. पर ये सब अब कुछ क्षणों बाद सदैव के लिए छूट जाएगा… फिर कभी न देखने को मिलेगा, न किसी से मिलने को मिलेगा और.. और ना ही मुझमे ऐसा कुछ बचेगा ही कि मेरा मन इन सबकी कल्पना ही कर सके.. मन की क्या कहूँ, मै तो स्वयं ही नही अस्तित्व मे रहूँगा…

वो क्षण उस मरते हुए व्यक्ति के लिए अतीव कष्टकारी होता होगा.. शारीरिक कष्ट से कई गुना अधिक… क्योंकि ये लगाव का बंधन बड़ा तगड़ा होता है…

मृत्यु इस बंधन को ही तोड़ती है..

इसलिए बहुत कष्ट होता है.. मरने वाले को भी, उसके सम्बन्धियो को भी..

जो किसी खास उद्देश्य के लिए जीते हैं और उसे प्राप्त करने से पहले ही, उस उद्देश्य की राह आसान करने के क्रम मे ही उन्हे मृत्यु का वरण करना पड़े.. तो वो भावनात्मक रूप से कितना कठिन और दुखदायी होता होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है..

मै कल्पना करता हूँ कि भगत सिंह फांसी के फंदे के सामने खड़े होकर क्या महसूस करते होंगे.. ?

चंद्रशेखर आजाद ने अल्फ्रेड पार्क में जब अंतिम बची गोली पिस्तौल मे भर कर अपनी कनपटी पर सटाई होगी उस वक्त वो क्या सोंचते होंगे… ?

इनके मन में मृत्यु से भय कदापि नही होगा, संसार, संबंधी, परिवार छूटने का दुख कदापि नही होगा..

पर क्या इनके मन मे ये बात एक क्षण के लिए क्या न आई होगी, कि उफ्फ्… ये देश की आज़ादी हम नही देख पाए.. जिसके लिए जीवन समर्पित कर दिया, उसी की राह आसान करने के लिए आज जाना पड़ रहा.. पर,

काश कि आजादी भी देख लेते… वो सेनानी देश की आजादी नही देख सके… उनकी मृत्यु मे केवल यही भावनात्मक कष्ट रहा..

सावरकर ने ऐसी मृत्यु नही प्राप्त की.. आजादी देखी.. पर, जीवनकाल में जितने, और जैसे कष्ट जे दिए गए वो अकल्पनीय हैं.. अतुलनीय कष्ट झेले उन्होंने…

नाम नही याद, पर किसी क्रांतिकारी को सुबह फांसी होने वाली थी… एक दिन पहले उन्हे आम खाने को मिले..

सुबह आम वैसे के वैसे ही पड़े देख कर जेलर बोला कि आपने आम मंगाये पर खाए नही.. और जैसे ही उन्हे हाथ मे उठाया तो देखता क्या है कि केवल छिलके ही बचे थे जो इस प्रकार रखे थे हास्य के लिए… फांसी की सुबह भी क्रांतिकारी के मन मे ऐसे भाव…

एक और नाम याद नही, फांसी की सुबह उन्हे व्यायाम करते देख जेलर आश्चर्य मे बोला, आपको कुछ पलों मे फांसी होने वाली है, और आपको व्यायाम करने की सूझी है?… कैसे इतने शांत रह सकते हैं?…

वो बोले, फांसी देना आपका काम है, अपनी ड्यूटी कीजिए, मेरा काम था अंतिम क्षणों तक इस शरीर को स्वस्थ रखना, मैं वही कर रहा हूँ..

मृत्यु सामने है, और वो व्यायाम कर रहा है… उस व्यक्ति की जीवटता का अनुमान लगाइये…

यूँ ही नही ऐसे लोगो के लिए हम, और ये राष्ट्र सदैव कृतज्ञ रहेगा..


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