सुभाष चंद्र बोस भारत की राजनीति के वह नायक रहे हैं जिन्हें वह स्थान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था. आज भी सुभाष बाबू को उनके लिए कम, नेहरू के विरुद्ध बनाए गए आरएसएस के नैरेटिव के नाम पर अधिक याद किया जाता है. दक्षिणपंथी अधिक याद करते हैं जबकि वह सोशलिस्ट, जो आज वामपंथी कहा जाता है, उस विचारधारा के थे.
हाँ नेहरू और गाँधी के विपरीत राजनीति के कारण भी उनको उतना स्थान नहीं मिला. और विशेष रूप से इस कारण से भी क्योंकि ब्रिटिश, भारत को स्वतंत्र करना नहीं चाहते थे. उन्हें सुभाष बाबू के कारण ही भारत को स्वतंत्र करना पड़ा. क्योंकि सुभाष बाबू के कारण भारत की सेना पॉलिटकलाइज यानी राजनैतिक हो चुकी थी.
अन्यथा ब्रिटिश यह मानते थे कि भारतीय सैनिक कैसे भी ऑर्डर फॉलो करने से पीछे नहीं हटेंगे. लेकिन जब भारत की सेना ही पॉलिटकलाइज्ड और नेशन स्टेट को पहचान चुकी थी तो उसे कंट्रोल करना कठिन था. और इसका एकमात्र कारण सुभाष चंद्र बोस ही थे जिन्होंने सेना का इस्तेमाल किया.
अन्यथा गाँधी तो सेना के राजनैतिककरण के विरुद्ध थे और इसीलिए द्वितीय विश्व युद्ध में भारत के लोगों को और भारत की सेना को ब्रिटिश पक्ष से लड़ने का साथ दिए. यह एक प्रमुख कारण था कि खस्ताहाल ब्रिटिश सेना भारत को संभाल नहीं पाती तो अधिक किरकिरी होती.
अब यहाँ एक और द्वंद था. बोस स्टालिन और हिटलर दोनों से मिलते थे. और दोनों ही का समर्थन चाहते थे. यानी एक अलग तरह का सोशलिस्ट नेशलिस्ट कॉम्बो जो होता, तो शायद आज आरएसएस और कांग्रेस दोनों ही ना होती. और माओ के चीन जैसी कोई सांस्कृतिक क्रांति होती.
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लेकिन इसका उलट भी हो सकता था यानी हो सकता भारत में फील्ड मार्शल या सैनिक डिक्टेटरशिप भी आ सकती थी. लेकिन अच्छा होने की संभावना अधिक थी. बोस रिवोल्यूशन के समर्थक थे तो डेमोक्रेसी और वह भी विशाल भारत में संभव नहीं होती.
एक समस्या और थी. जहाँ तक देखने से लगता है पाकिस्तान और बांग्लादेश में उसी समय की सेना और जनरल थे जिन्होंने आगे जाकर तख्ता पलट किया. तो सेना का पॉलिटिसाइजेशन भारत में भी भारी पड़ सकता था. लेकिन यह भारत की स्वतंत्रता के लिए बढ़िया सिद्ध हुआ.
बोस को द्वितीय विश्व युद्ध का एक आरोपी माना गया था. लेकिन चूँकि आधिकारिक रूप से मृत्यु हो चुकी थी. तो मुकदमा नहीं चला. इसीलिए एक षड्यंत्र कथा चलती है कि बोस जीवित रहे. जो कतई संभव नहीं है. अन्यथा यह कथा हिटलर के लिए भी चलती है.
सुभाष बाबू का जीवित रहना और इतने लंबे समय तक इसका रहस्य रहना संभव ही नहीं है. तो यह सब किस्सा कहानी हैं. हाँ यह है कि सुभाष बाबू की राजनीति अपने समय में कहीं आगे थी और बहुत शॉर्प थी. वह होते तो शायद भारत इस अचानक मिली डेमोक्रेसी के झटके से बच जाता.
बाहरी कड़ियाँ : Netaji Subhas Chandra Bose

This article is written by Harishankar Shahi, a journalist with in-depth knowledge of finance, politics, and science. He is known for presenting complex topics in a clear, factual, and reader-friendly manner. His writing focuses on analysis, context, and real-world impact, helping readers better understand issues that shape the economy, governance, and society. His Facebook profile link:
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