यदि किसी से पूछा जाए, विशेष रूप से उत्तर भारत और उससे भी विशिष्ट रूप से उत्तर प्रदेश में किसी से भी पूछा जाए कि बताओ कांशीराम और मुलायम में कौन बड़ा leader है. तो यदि वह विशिष्ट जाति का नहीं होगा, तो उसकी political understanding जो भी हो वह मुलायम को ही बड़ा नेता कह देगा.
क्योंकि सामान्य political understanding, वह चाहें किसी को भी वोट देता हो, वह media और narrative के अनुसार ही अपनी तस्वीर में मुलायम को धरतीपुत्र और socialism का बड़ा धुरंधर देखेगा. जबकि यह politics को गहराई से जानने पर ही पता चलेगा कि कांशीराम ने पूरी राजनीति स्वयं खड़ी की थी.
जबकि मुलायम जंगल पार्टी वाले कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया के जरिए socialist politics में प्रवेश करते हुए जाट जाति के नेता चरण और और फिर चंद्रशेखर, वीपी सिंह जैसे self-obsessed leaders के कंधे पर सवार होकर opportunistic politics से सीएम पद तक पहुँचे थे.
कांशीराम, पंजाब से महाराष्ट्र, आंध्रा और यूपी तक उस Dalit class को जोड़ते बटोरते और डीएस-4, बामसेफ बनाते आगे आकर बसपा तक पहुँचे. और उनकी ideology राजनीति के जरिए social reform की थी. ना कि राजा बनने की. यह इसी से दिखता है कि कांशीराम दलितों के लिए reserved seat से चुनाव नहीं लड़े.
तो ऐसा क्या हुआ कि मुलायम बड़े नेता हो गए और कांशीराम जैसे पूरा movement खड़ा करने वाले राजनेता को मुलायम के पुत्र अखिलेश ने अपने ego में मामूली नेता तक बताने की कृतघ्नता कर दी. इसके दो प्रमुख कारण थे. पहला था media management. और दूसरा RSS support.
बहुतों को आज Godi Media जैसे शब्द बड़े चुभते हैं. लेकिन यदि Godi Media की बात की जाए तो मुलायम और समाजवादी पार्टी और ऐसे ही अन्य socialist parties को Godi Media का पितामह कहा जा सकता है. क्योंकि इन लोगों ने power of media को समय से पहले समझा था.
उत्तर-प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके गोमतीनगर में एक पूरा बड़ा खंड Patrakarpuram ही कहलाता है. क्यों कहलाता है? क्योंकि यहाँ पत्रकारों को government की ओर से प्लॉट दिए गए थे. और यही नहीं उत्तर-प्रदेश से लेकर दिल्ली तक कई पत्रकार ऐसे हैं जिनका खर्च से लेकर घर तक मुलायम के दम पर बना.
और यही नहीं आज media के बारे में कहा जाता है. लेकिन 2013-14 में जब समाजवादी पार्टी की government थी और अहीर जाति के नेता मुलायम के सुपुत्र अखिलेश CM chair पर थे. तो पत्रकारों को भरी press conference में डांटा और उनको और उनके परिवार को helicopter rides पर घुमाने के ताने दिए जाते थे.
NDTV के अंग्रेजी के पत्रकार अनंत झणाणे को तो अखिलेश ने अपमानित करके भरे press conference से निकाल दिया और कोई बोल ही नहीं पाया. क्योंकि transfer-posting system का पूरा धंधा वहीं से चलता था. और इसी black money से पत्रकारों को control किया जाता था.
इसके बाद दूसरा कारण था RSS का support. यदि मुलायम गोली ना चलवाते तो क्या आज Mandir movement की फसल RSS काट पाती? या इसे दूसरे ढंग से पूछते हैं — क्या बिना villain के hero हो सकता है?
तो सपा को Islamic leadership और mob violence का प्रतीक बनाने से ही RSS good governance वाली बनती है.
और आज भी देखिए ना सपा हो या RJD हो, इनका goonda raj ही तो RSS-BJP की जीत के मुख्य factors हैं. बाकी बातें तो आगे-पीछे हैं.
RSS के कार्यकर्ता और BJP के विधानसभा अध्यक्ष पंडित केशरीनाथ त्रिपाठी ने BSP के विधायकों को तोड़कर SP की government बनवाई.
आज भी देखिए मुलायम को Padma Vibhushan भी RSS ने दिलवाया है और कुंभ में statue भी लगवाई है. क्या यह किसी और के लिए किया गया है?
तो RSS के उभार के मुख्य architect रहे हैं. वहीं कांशीराम की बड़ी गलती भी यही थी कि उन्होंने SP और मुलायम को इतना उभार दिया.
और वह media narrative में चूक गए. Star Plus के तत्कालीन पत्रकार आशुतोष को पीट देने की वह घटना भी कांशीराम के political life में भारी पड़ी.
और उनकी यह सोच कि उनका voter newspaper पढ़कर नहीं सोचता, यह थोड़ी strategic short-sightedness थी. जिसके कारण एक vacuum space बनता गया.
BSP किसी से भी alliance करके government बनाती रही है. इसके पीछे सीधा कारण था कि दलित-वंचित को secular vs non-secular game में कोई रुचि नहीं होनी चाहिए — और यही सही भी था और है भी.
लेकिन इसे media में greedy politics के रूप में दिखाया गया.
आगे चलकर जब social media और media के नए narratives का दौर आया, तब तक BSP बहुत पीछे जा चुकी थी और कांशीराम के नए narrative को बनाने का ध्यान भी Dalit literature में नहीं आया.
क्योंकि यह Bahujan trap में फँस चुके हैं. तो narrative की अपनी independent role भी होती है.
इस समय यदि good governance पर बात की जाए तो BJP का तिलस्म अकेले BSP तोड़ सकती है. लेकिन BSP का ना narrative है.
और चाहे मध्य-प्रदेश में Mishra-Ambedkar episode हो या उत्तर प्रदेश में Kshatriya-Dalit politics, सब मायावती और Dalit narrative को बदलने का conspiracy है.
जो संभवतः Dalit voice, यानी narrative और intellectual foresight की कमी के कारण सफल भी हो जाए.
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This article is written by Harishankar Shahi, a journalist with in-depth knowledge of finance, politics, and science. He is known for presenting complex topics in a clear, factual, and reader-friendly manner. His writing focuses on analysis, context, and real-world impact, helping readers better understand issues that shape the economy, governance, and society. His Facebook profile link:
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