बीते साल में राजनीति में देखा जाए तो सबसे अच्छा रहा दलित राजनीति के लिए जहाँ बहन मायावती फिर से एक्टिव दिखी हैं. और खास तौर पर सपा और आरएसएस की जुगलबंदी से आगरा में दलित बनाम क्षत्रिय का ड्रामा प्लान किया गया था उसे उन्होंने एक वीटो से तहस-नहस कर दिया.
क्योंकि राजनीति के जानकारों को याद होगा सहारनपुर के ऐसे ही स्क्रिप्टेड विवाद से भीम आर्मी का जन्म हुआ था. और जहाँ दलित का चेहरा बदलने के नाम पर दलित को उत्पाति झुंड बनाने का आरएसएस का नैरेटिव चल निकला था. तब संभवतः मायावती पर कोई प्रेशर था जो वह एक्टिव नहीं हो पाईं.
लेकिन इस बार एक्टिव होकर उन्होंने दलित नैरेटिव को बहुत ही शानदार तरीके से बचाया है. यहाँ बात क्षत्रियों की नहीं है. यह लोग तो आरएसएस के लतखोर हैं. तभी तो इनका हेलीकॉप्टर वाला शो आगरा में हुआ. लेकिन वहीं अयोध्या ब्राह्मण महासभा वाले मुँह पर जोधा थूक गए तो आवाज नहीं निकली.
यहाँ बात है दलित नैरेटिव की. आरएसएस, ओबीसी में अपनी पैठ और उनके क्षत्रियकरण के साथ. दलित उत्पीड़न अधिनियम को समाप्त करने का नैरेटिव बना रहा है. जिससे हरियाणा, पंजाब और बिहार व झारखंड जैसे भयानक दलित उत्पीड़न वाले इलाके में ओबीसी वर्ग को खुश करे.
क्योंकि यहाँ अधिकांश वहीं उत्पीड़न करने वाले हैं जो खुद को कहीं पिछड़ा तो कहीं किसान बताकर छिप जाते हैं. इसीलिए दलित नैरेटिव और राजनीति को संभालने का काम बहन मायावती से बहुत ही शानदार तरीके से किया है. और इस समय भी कुलदीप सिंह सेंगर वाले मामले में प्रतिक्रिया शांत है.
आरएसएस लगातार बसपा को ट्रैप करना चाह रही है. क्योंकि भीम आर्मी जैसी पार्टी उसका काम कर रही हैं. वहीं चिराग पासवान जैसे लीडरशिप और डैशिंग अर्बन लीडरशिप लाकर आरक्षण को संदिग्ध किया जा रहा है. दलित का आरक्षण आर्थिक समस्या से नहीं है. यह सदियों की सामाजिक भागीदारी का दावा है.
वीपी सिंह ने यदि ओबीसी आरक्षण ना दिया होता. तो संभवतः दलित विमर्श आज बहुत आगे आ चुका होता. ओबीसी आरक्षण ने दलितों की समस्याओं को आर्थिक की ओर ले जाने और मूलनिवासी के नाम पर सत्ता की उतावली ने इनके वास्तविक समस्या को अलग कर दिया.
यह तो सब पुरानी बाते हैं. लेकिन वर्तमान में दलितों को अपना नया रास्ता देखना होगा. सबसे पहले वह धर्म को गाली बकने की आदत से बाज आएँ. क्योंकि उनको नहीं दिख रहा है लेकिन आरएसएस के छतरीकरण और वीपी सिंह के आरक्षण के कारण ब्राह्मण लठैत की संख्या बढ़ रही है.
और दूसरी बात अब मंदिर प्रवेश दलित की समस्या है ही नहीं. क्योंकि अब मंदिर कमाई का अड्डा है. जैसे मस्जिद और मदरसे ताउन यानी चंदे के लिए चलाए जाते हैं. तो अब आपको बुलाया जाएगा. तो आप धर्म को गाली देकर अपने राजनैतिक उद्देश्य से पीछे हो रहे हैं.
दलित राजनीति का सूर्य तब तक उदय नहीं होगा जब तक कांशीराम के उस राजनैतिक सपने को पूरा नहीं करेगा. जहाँ किसी भी सामान्य सीट से कोई दलित प्रत्याशी केवल अपने बलबूते पर किसी पार्टी या किसी उच्च वर्ण को हराकर चुनाव जीते.
यह देखने में छोटा विषय है. लेकिन इसका उदाहरण अवेधश प्रसाद नहीं हो सकते हैं. यह नैरेटिव या तो बसपा या फिर निर्दलीय दलित प्रत्याशी की जीत पर होगा. दलित को अब मुसलमान या फिर किसी दूसरी पार्टी के लिए भीड़ बनने से अधिक अपने लिए नए काल में नई राजनीति को वापस पाना है.
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This article is written by Harishankar Shahi, a journalist with in-depth knowledge of finance, politics, and science. He is known for presenting complex topics in a clear, factual, and reader-friendly manner. His writing focuses on analysis, context, and real-world impact, helping readers better understand issues that shape the economy, governance, and society. His Facebook profile link:
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