अपराध (Crime) और जातिवाद (Casteism) को अलग समझने की ज़रूरत
हमें अपराध (Crime) और जातिवाद (Casteism) को अब अलग करके देखना सीखना होगा। और जातिवाद में भी, जाति के भीतर के जातिवाद (Intra-Casteism) और सामूहिक जातिवाद (Collective Casteism) को अलग करना होगा।
जैसे मेरठ में एक घटना होती है, जहाँ दलित समाज की एक लड़की का अपहरण हुआ। यह एक Crime है और इसे सुलझाना और न्याय दिलाना State का काम है।
State की ज़िम्मेदारी और चार Pillars of Democracy
और क्या State Action ले रही है या नहीं ले रही है, यह देखना जनता और सत्ता के विपक्षियों का भी है। साथ ही State के कर्ता-धर्ताओं का भी है।
और इसीलिए State के चार Pillars माने जाते हैं —
- Parliament (विधायिका)
- Executive (अधिकारी)
- Judiciary (न्यायपालिका)
- Expression / Media (अभिव्यक्ति)
Developed vs Undeveloped Society का फर्क
अब जो समाज Developed होते हैं, वहाँ अपराध और आपराधिक मंशा पर कार्य किए जाते हैं। उनकी विवेचना अलग होती है।
लेकिन Undeveloped Society रिएक्शनरी होती है। जैसे मेरठ की घटना दलित समाज की लड़की के साथ हुई, तो State को और Sensitive होकर Action करना होगा। क्योंकि पहले से दबे-कुचले समाज को यह ना लगे कि उनके साथ Crime और Atrocity (अत्याचार) दोनों हुए हैं।
Democracy का मूल उद्देश्य: Atrocity Prevention
और बाकी समाज को यह समझना होगा कि अत्याचार (Atrocity) होने से रोकना ही संपूर्ण Democratic System है।
अन्यथा तो अपराध तो होंगे ही और अपराध को मिटाने के लिए पूरे समाज को नैतिक होना पड़ेगा, जो विश्व के एक या दो देशों में ही हो पाया है। तो इसका Generalisation (सामान्यीकरण) नहीं किया जा सकता।
Dalit + Crime = Forced Atrocity Narrative
अब भारत जैसे समाज में होता क्या है कि यहाँ किसी भी आपराधिक घटना में यदि कोई Dalit है तो इसे जबरिया Atrocity सिद्ध करने का प्रयास होने लगता है।
और सारे Pressure Groups और Political Parties अपनी-अपनी राजनैतिक शत्रुता निकालने लगते हैं। इससे “भेड़िया आया” वाली दशा हो जाती है। Sympathy खत्म हो रही है।
जातिवाद के दो नए Forms
और जातिवाद भी अब दो तरह का हो चुका है —
1. Identity Based Casteism
पहला जातिवाद यह है कि हम पहचानते हैं कि हमारी यह जाति है। क्योंकि हमें जाति का Chief Minister, जाति का Officer, और जाति की पकड़ चाहिए।
क्योंकि हम में अभी भी राजतंत्र (Monarchy Mindset) जीवित है। हम प्रजा ही हैं, जनता नहीं हैं।
यह भी सामान्य है, उतना बुरा नहीं है — अन्यथा यहाँ झुंड हावी हो जाएँ, जैसे Jaat।
Marriage, Girl Child और Universal Casteism
अच्छा विवाह और लड़की एक ऐसा विषय है जिसका जातिवाद सभी में है। वह चाहें Brahmin हो या Dalit।
हर कोई लड़की या लड़के का विवाह जाति के बंधन के आस-पास चाहता है। और उसका भी Social Circle है।
नहीं तो दलितों के बीच तो कम से कम Inter-Caste Marriage होने लगते, जो अभी नहीं होते हैं।
Crime को Casteism बनाना: एक आदत
इसीलिए हर अपराध जातिवाद बना देना यह दिखाता है कि हम जातिवाद को आज तक नहीं पहचान पाए हैं।
हमारे लिए जाति आधारित Oppressor या Victim दिखाने की आदत लग चुकी है। जो हम अपनी-अपनी Political Ideology से करते हैं, ना कि किसी Rational दृष्टि से।
और झुंड इसमें अपना मौका खोजते हैं।
Bihar Case और Selective Outrage
अब बिहार में एक झा ब्राह्मण लड़की की हत्या का आरोप उसके परिवार वालों पर है कि वह किसी दलित लड़के से शादी करना चाहती थी, इसीलिए मार दिया।
अब इसका प्रचार Ravish Kumar जैसे स्वयं उच्च जाति से आने वाले कर रहे हैं। जो शायद ही अपनी परिवार की किसी भी बिटिया का रिश्ता “दीन-हीन, निर्धन” दलित के पास ले जाएँगे।
Elite Inter-Caste Marriage का भ्रम
रवीश कुमार की बेटी यदि दलित से भी विवाह करेगी तो वह Elite ही होगा। यानी Class Struggle की आहूति स्वयं से कोई नहीं देता।
यहाँ तर्क दिया जाएगा कि इच्छा देखी जाएगी। तो यही बात तो सबके साथ है।
जैसे उनकी बेटी को “दीन-हीन, निर्धन” दलित नहीं दिखेगा, वैसे ही किसी सामान्य ब्राह्मण को गुस्से में Honour Killing सूझ सकती है। यह Impulsive Crime हैं।
Class Equality ≠ Social Revolution
अशोक चौधरी दलित थे, लेकिन उनकी बेटी शांभवी चौधरी का विवाह उच्च जाति के कुणाल किशोर के बेटे से हुआ।
यह कोई Social Revolution नहीं है बल्कि यह Class / Economic Equality वाले परिवारों के बीच का संबंध है।
जैसे रायबरेली के बाहुबली अखिलेश सिंह की MLA बेटी ने सैनी समाज के अंगद सैनी से विवाह किया। सामान्य ठाकुर नहीं करेगा।
Casteism से ज़्यादा Economism
अब यहाँ जातिवाद नहीं, Economism हावी होता है।
जबकि सामान्य परिवारों में अभी भी जातिवाद हावी है, क्योंकि उनका Social Class अलग है।
Political Families और Hypocrisy
क्या अहीर जाति के नेता मुलायम या अखिलेश परिवार का कोई भी एक दामाद दलित है? नहीं है।
और क्या सामान्य जाट, अहीर, गुर्जर किसी दलित के यहाँ विवाह करेंगे?
अभी कितने दिन नहीं बीते हैं जब जाटों के यहाँ Honour Killing हर दूसरे दिन मीडिया में आती थी।
Media Control और Jaat Narrative
हरियाणा और दिल्ली के जाटों ने अपने Builder Mafia और Political Ground Power से मीडिया के ऐसे हाथ-पाँव बाँधे कि आज जाट जाति की बड़ी-बड़ी पत्रकाराएँ आ गई हैं।
लेकिन एक ने भी हरियाणा या पंजाब के दलित उत्पीड़न पर कभी नहीं लिखा। Bhagana Dalit Rape Case किसी सांगवान ने रिपोर्ट नहीं किया।
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Selective Caste Vision
उन्हें यूपी और बिहार में जातिवाद दिखता है। क्योंकि जाट, यूपी और बिहार को गाली बकते हैं।
देश पर हमला हुआ, लेकिन किसी ने जाट को Terrorist नहीं कहा।
क्योंकि उनका अपराधी और बुद्धिजीवी Mob Mindset पर ही सोचता है।
निष्कर्ष: Crime और Atrocity का फर्क समझिए
तो यह बहुत सारी चीजें हैं जो समाज को तय करती हैं।
इसीलिए हर अपराध जातीय उत्पीड़न नहीं होता।
और रही जातीय उत्पीड़न की बात — तो गाँवों में या आस-पास देखिए जहाँ बहुजन वाले ही सर्वाधिक दलित उत्पीड़न कर रहे हैं।
तो Crime और Atrocity का अंतर कीजिए।
अन्यथा हरदम रोने से Narrative Shift हो रहा है।
अब अभिव्यक्ति रवीशों के कंट्रोल से बाहर है।
हम 2026 में हैं — यह नहीं दिख रहा है तो बुरी गत हो सकती है।
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This article is written by Harishankar Shahi, a journalist with in-depth knowledge of finance, politics, and science. He is known for presenting complex topics in a clear, factual, and reader-friendly manner. His writing focuses on analysis, context, and real-world impact, helping readers better understand issues that shape the economy, governance, and society. His Facebook profile link:
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