आज ईलॉन मस्क की एक बात पर पूरा social media पटा पड़ा है।
ईलॉन ने वही पुरानी बात दोहराई है— “money can’t buy happiness” यानी धन से प्रसन्नता नहीं खरीदी जा सकती है।
यह बड़ी पुरानी सी कहावत है, जब धन ऐसा था भी नहीं। यह तब के लिए था।
लेकिन क्या आज धन से प्रसन्नता नहीं खरीदी जा सकती है? धन से ही प्रसन्नता खरीदी जाती है।
कभी किसी ऐसे व्यक्ति से पूछिए जो परिस्थिति में फंसा हो और वह पेट भरने और मिठाई खाने के बीच चुनने को विवश हो।
या उस बच्चे से पूछिए जो ललचा रहा हो टॉफी या मिठाई खाने को।
क्या बीत रही होगी?
लेकिन वह समझता हो कि परिस्थिति नहीं है। यहाँ उनकी बात नहीं कर रहा हूँ जो professional गरीब हैं।
क्योंकि वह तो मौका आने पर दूसरे को धोखा देकर मिठाई ही नहीं, बहुत कुछ खा लेंगे।
या अपने छोटे से छोटे लाभ में कोई भी अमानवता कर जाएँगे। यह गरीब अलग हैं, यह गरीबी को अपना बहाना मानते हैं।
Happiness का दर्शन
तो बात प्रसन्नता की है।
मेरा जवाब यही है कि जब आप दुनिया के शिखर पर होते हैं, तो आपको पदार्थ जगत मिथ्या ही लगता है।
यानी जब आपको वह सब चीज पाना आसान लगेगा,
तो आप सच्चा प्यार खोजेंगे, सच्ची खुशी तलाशेंगे।
यह सच्ची चीज आपको मिलेगी नहीं क्योंकि आप खुद ही सच्चे नहीं हैं।
सच्चे यह कि क्या आप पैसों का त्याग कर देंगे? जब नहीं करेंगे तो कैसे पैसे प्रसन्नता नहीं खरीद सकते हैं?
वैराग्य हमेशा भतृहरि को ही होगा। क्योंकि बाकी तो अभी वैराग्य के नैराश्य भाव तक पहुँचे ही नहीं हैं। यह दर्शन यानी philosophy उन पर सही लगती है जो संसार को उस भाव से देखेंगे।
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Power, Money और Reality
आपके पास धन है तो आप गॉर्ड रख सकते हैं, जो आपके दरवाजे की security करेगा।
वर्ना लोग आपके घर के सामने गाड़ी खड़ी करना और थूकना अपना अधिकार मानते हैं।
आपके पास पैसा होगा तो आप शांत जगह घर खरीद सकते हैं। नहीं तो आपके पड़ोस में शादी होगी और हजारों वॉट का DJ बजेगा।
इसीलिए धन और उससे जुड़ी शक्ति आवश्यक है। यह प्रकृति का balance है।
और रही बात प्रसन्नता की—
तो क्या प्रसन्नता केवल आप पर निर्भर है? नहीं, यह एक बड़ा natural शब्द है।
आपको सदा दूसरों की आवश्यकता है। तभी आपकी प्रसन्नता है।
यह ऐसा ही है कि सड़क पर सुरक्षा केवल आपके ही हाथ नहीं है। कोई भी शराब पीकर या कोई गरीब अपने गरीबीपने में आपको मार सकता है।
बाहरी कड़ियाँ : Elon Musk says money can’t buy happiness. Research shows he’s both right and wrong.

This article is written by Harishankar Shahi, a journalist with in-depth knowledge of finance, politics, and science. He is known for presenting complex topics in a clear, factual, and reader-friendly manner. His writing focuses on analysis, context, and real-world impact, helping readers better understand issues that shape the economy, governance, and society. His Facebook profile link:
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