टुंडे के कवाब और इदरीस की बिरयानी की लोकप्रियता
लखनऊ के खानों में नॉन-वेज यानी मांसाहारी खाने बड़े प्रसिद्ध हैं. और उनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं टुंडे के कवाब, और इदरीस की बिरयानी.
मुसलमानों की कौन कहे हर दूसरा, खाने का शौकीन को टुंडे के कवाब और इदरीस की बिरयानी को याद करता है.
क्या सच में यह चिकन या मटन है?
लेकिन कितनों को पता होगा यह दुकानें चिकन या मटन की नहीं बीफ की हैं?
जी चिकन या मटन यानी मुर्गे और बकरे के मांस के नहीं बल्कि बीफ यानी भैंसे के मांस और हड्डी के गूदे यानी नल्ले के कवाब होते हैं.
हाँ यह है कि मटन के भी कवाब बनाए जाते हैं.
“बड़े” और “छोटे” का फर्क
लेकिन आप टुंडे और इदरीस के यहाँ जाएँ तो आपको पूछा जाएगा कि “बड़े” का कवाब लेंगे या छोटे का.
स्वाद, परहेज और विरोधाभास
हिंदू ग्राहक और भैंसे का मांस
अब कई हिंदू जो भैंसे के मांस से परहेज करते हैं. लेकिन आपको टुंडे और इदरीस का स्वाद बताते घूमेंगे.
फूड एक्सपर्ट्स और अधूरी सच्चाई
और यही नहीं आपको कई फूड के एक्सपर्ट जिसमें शुद्ध पंत ब्राह्मण पुष्पेष पंत भी शामिल हैं.
वह आपको लखनऊ के खाने की झौव्वा भर प्रशंसा में यह नहीं बताएँगे कि टुंडे मियाँ भैंसे के कवाब बनाते थे.
सस्ता स्वाद और असली कारण
चौक की टुंडे की दुकान
चौक की टुंडे की दुकान सस्ती है. क्योंकि वहाँ भैंसे के आइटम ही मिलते हैं. जिसे तारीफ के रूप में पेश किया जाता है.
भैंसे का मांस और कीमत
जबकि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि भैंसे का गोश्त सस्ता होता है. और टुंडे की हर दुकान पर भैंसे का कवाब मौजूद होता है.
जो उसी बर्तन में परोसा जाता है और मिलता है.
जो प्रसिद्ध नहीं हुए, क्यों?
आलमगीर और सखावत जैसी दुकानें
अच्छा आप देखेंगे की आलमगीर, सखावत जैसी दुकानें उतनी प्रसिद्ध नहीं हैं. जबकि उनकी दुकानें भी लखनऊ के खानें बनाती हैं.
प्रचार तंत्र और भैंसे का मांस
क्योंकि यहाँ भैंसे के मांस नहीं मिलता है. और नवाबी प्रचार तंत्र और लखनऊ के ब्राह्मण बाहुल्य प्रचार तंत्र से यह बात नहीं बताई जाती है कि अधिकांश चीज बड़े की है.
भारत में बीफ की अलग व्याख्या
लखनऊ में बीफ का अर्थ
बीफ को लेकर भारत की व्याख्या अलग तरह की है. जैसे लखनऊ में बीफ का माने गौ-मांस नहीं बल्कि भैंस का मांस होता है.
मिलावट और पहचान का सवाल
और यह आपको टुंडे, इदरीस, रहीम, करीम सब मशहूर दुकानों पर बिल्कुल मिक्स यानी मिलावट के साथ मिलता है.
मिलावट यानी आप पहचान नहीं सकते हैं.
नवाबी बावर्ची और असली विरासत
सखावत, आलमगीर और वाहिद
जबकि सखावत, आलमगीर और वाहिद जैसी दुकानें वह हैं जो उन्हीं नवाबी बावर्चियों की दुकानें हैं. लेकिन यहाँ भैंस यानी बीफ नहीं मिलता है.
पसंद और प्रचार
तो नवाब और उनके प्रचारकों को पसंद नहीं आते हैं. यहाँ वही जाते हैं जिनको पता है.
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लल्ला बिरयानी और पहचान की राजनीति
अजय कुमार उर्फ़ लल्ला
और तो और लल्ला यानी अजय कुमार हिंदू होने के बाद भी प्रसिद्ध नहीं हैं. लल्ला जिनकी लल्ला बिरयानी उसी चौक में है और इदरीस के पास ही है.
स्थानीय लोकप्रियता बनाम राष्ट्रीय पहचान
वह लखनऊ वालों के बीच तो बहुत प्रसिद्ध है. लेकिन हिंदू होने के बाद भी मांसाहारी हिंदू इनका वह प्रचार नहीं करते जो होना चाहिए.
जाति, शाकाहार और राजनीति
हालाँकि अजय कुर्मी जाति से हैं. जो अवध में बहुसंख्यक और प्रभुत्व में तो है. लेकिन शाकाहारी अधिक है.
अधिकांश कुर्मी शाकाहार और किसी ना किसी बाबा या आरएसएस के संपर्क में हैं तो वे शाकाहारी बनने पर अधिक विश्वास करते हैं.
ताज़गी बनाम बासी खाना
लल्ला की साफ़ नीति
जिसके कारण भी शायद लल्ला को वह प्रसिद्धि नहीं मिली. जबकि लल्ला का स्पष्ट है कि जो बिकी बिकी, बाकी सब फ्री बांट दी जाती है. बासी कुछ नहीं. सब ताजा.
मुस्लिम होटलों पर गंभीर आरोप
जबकि मुस्लिम होटलों में हर चीज आपको बासी क्या जूठी भी मिल सकती है.
आख़िरी लेकिन अहम तथ्य
कायस्थ किचन की भूमिका
और यह भी एक तथ्य है कि लखनऊ के अधिकांश मांसाहारी खाने कायस्थों के हैं. बटेर से लेकर कोरमा तक सब कायस्थ किचन से निकला है.
नाम किसके, काम किसका?
लेकिन हिंदूवाद के चक्कर में यह सब मुसलमान और नवाबों के नाम मढ़ दिया गया है.
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This article is written by Harishankar Shahi, a journalist with in-depth knowledge of finance, politics, and science. He is known for presenting complex topics in a clear, factual, and reader-friendly manner. His writing focuses on analysis, context, and real-world impact, helping readers better understand issues that shape the economy, governance, and society. His Facebook profile link:
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