भारत की जनसंख्या: सॉफ्ट सुपरपावर या संकट का भंवर?

Illustration showing India at a demographic crossroads, with a young population choosing between economic growth and crisis caused by unemployment and pollution.

भारत की जनसंख्या एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ से इसके दो रास्ते हैं। एक इसे सॉफ्ट सुपरपावर बना सकती है, वहीं दूसरी इसे एक भंवर में डाल सकती है।

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जैसे ही मैं नॉर्वे से भारत में कदम रखता हूँ, यूँ लगता है कि मानवों के मरुस्थल से समुद्र में आ गया। जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) पूरी पलट जाती है, जब सड़कों पर वृद्धों की चहलकदमी के बजाय युवाओं की भीड़ दिखती है। एक काम के लिए जहाँ एक तरफ भुगतान करने पर भी लोग नहीं मिलते, यहाँ दर्जनों हाथों से आप मोल-भाव कर रहे होते हैं। भारत में कदम-कदम पर छोटे-मझोले दुकानों से लेकर शीशमहल से मॉल बने हैं। दुकानों में खरीदारों की कतार लगी है। जहाँ यूरोप में प्राथमिक विद्यालय बच्चों की कमी के कारण बंद करने पड़ रहे हैं, यहाँ नित नए स्कूल-कालेज खुल रहे हैं। प्रतियोगियों के कोचिंग संस्थानों के मध्य प्रतियोगिता चल रही है।

आज भारत की पैंसठ प्रतिशत से अधिक आबादी काम कर सकती है, जो दुनिया में सर्वाधिक है! यह भारत की शक्ति है जो जनसांख्यिकी लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) कहलाती है। आज भारत उस तिराहे पर खड़ा है, जहाँ से वह जापान जैसे देशों की तरह इस जनसंख्या का उपयोग कर आर्थिक महाशक्ति बन सकता है। वहीं कुछ कदम अगर ठीक से न पड़े तो बेरोजगारी, स्वास्थ्य और पर्यावरण समस्याओं के कुचक्र में फँस सकता है।

15-60 वर्ष उम्र की विशाल भारतीय जनसंख्या पर पूरी दुनिया की नजरें हैं। अगले तीन-चार दशकों तक यह अनुपात कायम रहेगा, जिसका अर्थ है कि मेहनत करने वाले, कमाने वाले, निर्माण और नवाचार करने वाले लोगों की कमी न होगी। आकलन हैं कि यह स्थिति 2055 तक कायम रहेगी।

अधिक लोग काम करेंगे। कामकाजी महिलाएँ बढ़ेंगी। लोग कमाएँगे, उपभोक्ता बनेंगे और बचत के साथ निवेश करेंगे। चूँकि वृद्धों और बच्चों की जनसंख्या अपेक्षाकृत कम होगी, उन पर खर्च भी कुछ कम होंगे। ऐसे में निवेश का लाभ निर्माण कार्यों को हो सकता है। इतने कामकाजी लोगों और उपभोक्ताओं के मद्देनजर बड़े स्तर पर बहुराष्ट्रीय उद्योग स्थापित हो सकते हैं। न सिर्फ भारत बल्कि अन्य देशों को भी भारत के इस कौशल और श्रम-शक्ति का लाभ पहुँचेगा। विदेशी पूँजी भारत की दिशा में आने की संभावना बढ़ेगी। अन्य देशों पर राजनैतिक प्रभाव डालने की क्षमता बढ़ सकती है। इसे अक्सर विदेशी अखबार सॉफ्ट सुपरपावर कह कर संबोधित करते हैं।

अगर जापान का उदाहरण लें तो वह जनसंख्या के ऐसे ही स्थिति में 1955 में पहुँचा था, और लगभग दो दशक पहले इससे बाहर आ गया। इस मध्य विश्व-युद्ध की मार खाए इस देश ने बहुत तेजी से आर्थिक तरक्की की। लेकिन यह ध्यान रहे कि भारत की जनसंख्या जापान के मुकाबले लगभग बारह गुणा अधिक है। जनसंख्या का वितरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, संस्कृति, कार्यशैली और अनुशासन भिन्न है। भारत के लिए जापान मॉडल अधिक उपयुक्त न होगा।

मसलन भारत की यह बढ़ती युवा आबादी उन राज्यों में अधिक है जहाँ की सामाजिक-आर्थिक स्थिति डावाँडोल है। जब उन अपेक्षाकृत गरीब राज्यों में पर्याप्त शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल उपलब्ध होगा, तभी तो वहाँ की जनसंख्या उत्पादक होगी। अन्यथा यह बढ़ती युवा आबादी अपार बेरोजगारी की ओर बढ़ती जाएगी।

दुनिया बहुत तेजी से डिजिटल युग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों की ओर बढ़ रही है। ऐसे कयास लग रहे हैं कि कई पारंपरिक नौकरियों पर भी गाज गिरेगी, या उनका स्वरूप बदलेगा। तकनीकी युग में अन्यथा भी मानवीय परिश्रम घटने की संभावना है। जब ईंट ढोने के लिए मशीनें होंगी, तो इन मशीनों को चलाने के लिए प्रशिक्षित कर्मी लगेंगे। अशिक्षित और अकुशल लोगों के लिए अवसर घट सकते हैं। कृषि का मशीनीकरण भी समय के साथ अवश्यंभावी है, जो भारत की उस ग्रामीण जनसंख्या को प्रभावित करेगी जिनकी जीविका पारंपरिक कृषि है। यहाँ राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की भूमिका बढ़ जाती है, जो अधिक से अधिक युवाओं को शिक्षित-प्रशिक्षित करने के उपाय कर रही है।

उद्योगों और नौकरियों के लिए शहर की ओर रुख करती जनसंख्या को भी नियंत्रित करने की जरूरत होगी। वे जहाँ हैं, वहीं रोजगार के अवसर मिले तो बेहतर है। ऐसा कुछ हद तक दिखने भी लगा है कि महानगरों के अतिरिक्त कई दूसरी और तीसरी श्रेणी के नगरों में पहले से अधिक रोजगार हैं। गाँवों में भी रोजगार और कमाने के अवसर बढ़ रहे हैं। लेकिन शहरों की ओर रुख करने की होड़ फिर भी खत्म नहीं हुई।

यह भी आवश्यक है कि यह कामकाजी समूह अगले तीन-चार दशकों तक स्वस्थ और सक्रिय रहे। फिलहाल भारत मानव विकास सूचकांक में बहुत पीछे है। शहरी इलाकों में प्रदूषण, बढ़ती तपन और उमस, वहीं पहाड़ी इलाकों में भू-स्खलन जीविका के लिए खतरे बनते जा रहे हैं। हालाँकि स्वास्थ्य की उपलब्धता के लिए आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ सफल हो रही हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि बढ़ती जनसंख्या से तारतम्य बना रहे। आबोहवा अच्छी रहे, और लोग काम पर जाने को सक्षम हों, तभी तो आर्थिक और सामाजिक प्रगति होगी।

पिछले दशक में ऐसा माहौल बना है कि बढ़ती आबादी अगर समस्या है, तो इसके एक खास अनुपात के कुछ दूरगामी लाभ भी हैं। अधिकांश पश्चिमी देशों में जहाँ वृद्धों का आबादी अनुपात बढ़ता जा रहा है, भारत की स्थिति उलट है। मानव संसाधन भारत की सबसे महती संपत्ति बन कर उभरी है, और इस कारण यह जरूरी है कि इसे सँभाल कर रखा जाए। बेरोजगारों को अवसर और मूलभूत सुविधाएँ मिले। बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा हो। प्रदूषण का स्तर घटे। तभी इस जनसंख्या से राष्ट्र-निर्माण की संभावना बढ़ेगी।

[प्रवीण कुमार झा, लेखक एवं चिकित्सक, कॉन्ग्सबर्ग, नॉर्वे]

यह लेख जुलाई 2024 में राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित


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