पृथ्वी और चंद्रमा: ब्रह्मांड की सबसे सटीक खगोलीय लय

EARTH AND MOON

ब्रह्मांड का तो हम लोगों को बहुत ही निश्चित पता नहीं है। और पता तो सौरमंडल का भी बहुत नहीं है। लेकिन फिर भी सौरमंडल का काफी हद तक सटीक अनुमान हम लगा लेते हैं। क्योंकि काफी सैटेलाइट और स्पेस स्टेशन हैं हमारे पास।

लेकिन यदि आपसे पूछा जाए कि कौन से दो पिंड हैं जो एकदम सटीक लय में घूमते हैं।

यहाँ यह विशिष्ट है कि सभी ग्रह सूर्य के चारो ओर चक्कर लगाते हैं और इन ग्रहों के अपने उपग्रह हैं जो उनके चक्कर लगाते हैं। यानी इन खगोलिय पिंडों की एक घूमने की लय होती है। जो पिंड यानी प्लेनेट या लूनर यानी उपग्रह की अपने मुख्य ग्रह के सापेक्ष होती है।

लेकिन यह प्लेनेट एक दूसरे से सटीक सिंक में होते हैं?

नहीं। अधिकांश ग्रह सटीक सिंक में नहीं होते हैं। जैसे धरती का घूमने का पथ जो है वह इलिप्टिकल है और सूर्य इसके केंद्र में होता है। और चूँकि विज्ञान की सामान्य जानकारी रखने वालों को पता होगा कि इलिप्स यानी दीर्घवृत्त के दो केंद्र होते हैं। लेकिन सूर्य और पृथ्वी का संबंध पूर्णतः ऐसा भी नहीं है।

सूर्य कभी भी धरती के घूमने के क्रम में पूरी तरह से केंद्र में नहीं होता है। थोड़ा इधर-उधर हो जाता है। क्योंकि वीनस यानी शुक्र और जुपिटर यानी बृहस्पति जैसे बड़े ग्रह अपने गुरुत्वाकर्षण का एक प्रभाव डालते हैं। जिससे थोड़ी स्थिति कहीं किसी डिग्री में बदल जाती है।

यानी सौर मंडल में किसी भी प्लेनेट की गति सिंक में नहीं है?

नहीं, ऐसा भी नहीं है। एक प्लेनेट और उसका लूनर ऐसा है जो आज तक एक ही सिंक में है। और वह प्लेनेट है पृथ्वी और उसका लूनर यानी चंद्रमा।

जी, पृथ्वी और चंद्रमा एक ही सिंक में घूमते हैं। एकदम एक ही लय-ताल पर। इसे कहते हैं पृथ्वी और चंद्रमा की सटीक लय

हम सभी या हमारे पूर्वज जो भी अब तक आए हैं, उन सभी ने चंद्रमा का केवल एक ही पक्ष देखा है। यानी चंद्रमा का जो हिस्सा हमारे पड़-पड़दादा ने देखा होगा वही हम भी देख रहे हैं। पृथ्वी और चंद्रमा की घूमने की स्थिति इतनी सटीक सिंक में है कि वह नहीं बदली है।

और इसीलिए चंद्रमा के दूसरे स्फीयर यानी फार साइड पर मिशन की लैंडिंग कराना बहुत ही कठिन काम रहा है। यहाँ चंद्रमा के साउथ पोल की बात नहीं कर रहा हूँ, जहाँ अभी हाल ही में भारत का मिशन चंद्रयान पहुँचा था। यहाँ उस गोलार्द्ध की बात है जो अभी हमारे सामने नहीं आया है।

नासा इस मिशन को लेकर तैयारी में है कि वहाँ कोई मशीन मिशन भेजा जाए या फिर कोई मानव मिशन। लेकिन समस्या लैंडिंग की गणना की है। और उससे बड़ी समस्या रेडियो वेव और अन्य ट्रांसमिशन की है।

लेकिन अभी हमने महज पचास वर्षों में यहाँ तक की सफलता प्राप्त कर ली है। तो आशा है।


इस विषय पर और जानकारी के लिए पढ़ें: https://science.nasa.gov/moon/

इस वेबसाईट पर और पढ़ें : https://inkindianews.com/hare-market-popularity-india-harshad-mehta-impact/

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