शेयर मार्केट को लेकर भारत में सर्वाधिक लोकप्रियता और रातोंरात करोड़पति बनने चस्का हर्षद मेहता के नाम से ही आया. अन्यथा आधे से अधिक देश को पता ही नहीं था कि शेयर होते क्यों हैं. हर्षद मेहता की अमीरी सुनकर देश में लोगों को शेयर बाजार की ललक अधिक लगी.
बाद में इंटरनेट और टर्मिनल ट्रेडिंग जो मुख्य तौर पर अमेरिकी ट्रेडिंग मॉडल था. जहाँ डे ट्रेडर एक पूरा प्रोफेशन बन चुका था. डे ट्रेडर शब्द को जो लोग नहीं जानते हैं. उनके लिए बता दूँ कि डे ट्रेडर वे लोग होते हैं. जो केवल शेयर की ट्रेडिंग ही पूर्णकालिक काम के तौर पर करते हैं.
उदारीकरण ने जब बैंकिंग प्रणाली और बिजनेस नए रूप में बदला तो अमेरिकी कंपनियों के स्टॉक और स्टेकहोल्डर आदि का मॉडल यहाँ भी आने लगा. मुख्य तौर पर इंटरनेट का योगदान इसमें सर्वाधिक था. अन्यथा फोन पर सौदा लगाना और काटना भारत में इतना आसान नहीं था.
स्टॉक मोटे तौर पर किसी कंपनी द्वारा मार्केट से पैसा उठाने के लिए मार्केट में रखी गई साझेदारी का एक हिस्सा होते हैं. जैसे मान लीजिए 10% हिस्सेदारी मार्केट में रखता हूँ. और इसके लिए 1 करोड़ शेयर जारी करता हूँ. क्योंकि कोई भी कंपनी और उसका वैल्यूएशन इतना होता है जिससे 10% कोई एक व्यक्ति नहीं खरीद पाएगा.
भारत के स्टॉक के लिए 10 रूपए की फेस वैल्यू पर शेयर जारी किए जाते हैं. यह केवल एक मानार्थ कीमत होती है. यह मार्केट वैल्युएशन और प्राइस बैंड यानी ऑफर प्राइस से अलग होती है. क्योंकि यदि वैल्यूएशन गड़बड़ाए तो भी 10 रूपए से नीचे यह शेयर जारी नहीं होंगे. यही एक सीमा है. यह केवल पहले के लिए है.
बाकी वास्तविक मूल्यों पर शेयर यानी स्टॉक प्राइस उस कंपनी की साख यानी मार्केट क्रेडिट होती है. अन्यथा रोज की ट्रेडिंग से उस कंपनी को कुछ नहीं मिलता है. उसकी असली कमाई मार्केट वैल्युएश और ओवर प्राइस बुक बिडिंग से ही होती है. आगे सब कुछ फंडामेंटल तय करते हैं.
और फंडामेंटल यानी कंपनी के अकाउंट, हिस्ट्री और आगे उसकी योजनाएँ जिसमें निवेश किया जा रहा. या जिस विस्तार के लिए यह इक्विटी लांच की गई है. यह यह इक्विटी, शेयर और स्टॉक मोटे तौर पर एक ही चीज होते हैं. बस इक्विटी में थोड़े बदलाव होते हैं कि यह कंपनी का है या डेब्ट फंड है. बाकी काम वही है.
तो जब भी किसी कंपनी के स्टॉक प्राइस चढ़ते हैं तो कंपनी का वैल्युएशन बढ़ता है. इसे ऐसे समझिए कि मान लीजिए मेरी कोई कंपनी है. और मेरी कंपनी का कोई एसेट यानी संपत्ति नहीं है. लेकिन फिर भी मेरे प्रति शेयर की मार्केट वैल्यू 500-5000 के बीच है. तो मेरी कंपनी का आकलन इसी पर होगा.
इसी आधार पर मुझे रिस्क टू रिवार्ड (फिर आगे बात होगी) के आधार पर लोन से लेकर टेंडर तक मिल जाएँगे और मेरा बिजनेस चलता रहेगा. जबकि हो सकता है मेरे सारे फंड मार्केट में अटके हैं. और मेरे पास घर तक ना हो. और किसी को कानों कान खबर तक ना हो. यह भी बहुत मामलों में संभव होता है.
कई बार कंपनी अकाउंट में मार्केट में लगे पैसे या रनिंग कॉस्ट या अन्य बहुत सी चीजें दिखाकर कंपनी के लॉस को बढ़ाया या घटाया जाता है. और जब तक इसका पता चलता है तब तक एक ही दिन में कंपनी डूब जाती है नहीं तो सबकुछ ठीक रहता ही है. और यह हर मार्केट इकनॉमी वाले देश में है.
चूँकि हमारे देश में ट्रेडिंग और मुख्यतः स्टॉक ट्रेडिंग केवल जादू लगती है और शॉर्ट कट है. इसीलिए हमारे सपने जल्दी टूटते हैं. ट्रेडिंग में स्टॉक प्राइस का ऊपर जाना बुलिंग होता है और नीचे आया बीयरिंग कहलाता है. इतना ज्ञान तो हर्षद मेहता पर बनी सीरीज से सभी ने ले ही लिया होगा.
मार्केट इकनॉमी में एक ही कंपनी और उस कंपनी के सप्लायर और उस कंपनी आउटसोर्सर एक ही मार्केट से बंधे होते हैं. जैसे उदाहरण के लिए कोई कार कंपनी ले लीजिए. अब उस कार कंपनी का इंजन आता है चीन से. फ्यूल पंप बनता है इंडिया में. लोहा, पेंट सब इंडिया से आता है.
असेंबली की सर्विस का काम दूसरी कंपनी कर रही है और मार्केट उसकी मूल कंपनी कर रही है. यानी आप देखेंगे कि पेंच से लेकर प्लास्टिक तक में पचासों कंपनियाँ शामिल हैं और कई बार सब की सब मार्केट में उतरी होती हैं. यानी सबके स्टॉक लगे हैं.
मान लीजिए किसी शिपिंग कंपनी का कोई जहाज डूब जाए. उस पर केवल इसी कंपनी के इंजन आ रहे हैं. तो क्या होगा? पूरा इंडस्ट्री और क्रॉस इंडस्ट्री नेटवर्क हिल जाएगा. और फिर अगली तिमाही के बाद बैलेंसशीट बिगड़ेगी तो क्या तूफान मचेगा? आपको लगेगा कोई बात नहीं यह इंश्योरेंस से कवर हो जाएगा.
नहीं यही आते हैं बुल और बीयर. और वह इस तिमाही के इस लॉस और शिपमेंट डिले को बढ़ाकर दिखाएँगे. और बीयर क्या करेगा कि वह बड़ा स्टॉक मार्केट में उतार देगा और हर रेट पर बेचेगा. जिससे प्राइस गिरने लगेंगे और मार्केट में पैनिक यानी घबराहट फैलेगी.
और इससे छोटे इंवेस्टर के दबाव म्युचुअल फंड से लेकर सब पर पड़ेंगे और स्टॉक क्रैश करने लगेंगे इससे कंपनी को कोई विशेष तत्कालीन घाटा नहीं होगा. लेकिन इसका बड़ा फायद मार्केट के सटोरियों को होगा जो कीमत के घटने के अंतर पर सारा फायदा कमाएँगे. इसमें कई बार कंपनियाँ खुद शामिल होती हैं.
तो शेयर मार्केट एक आम मार्केट के जैसा ही है. जहाँ कई चीजें कई उन चीजों पर निर्भर जिनका कोई कंट्रोल किसी के भी पास नहीं है. सब यहाँ मौके का लाभ उठाने के लिए बैठे हैं. बस कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल और अमेरिकी ट्रेडिंग के शब्द आने से हमें थोड़ा प्रोफेशनल लगता है. आगे बुल, फ्यूचर और ऑप्शन की बात करेंगे.

This article is written by Harishankar Shahi, a journalist with in-depth knowledge of finance, politics, and science. He is known for presenting complex topics in a clear, factual, and reader-friendly manner. His writing focuses on analysis, context, and real-world impact, helping readers better understand issues that shape the economy, governance, and society. His Facebook profile link:
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